तुम बिन ऐसा लगता जीवन,
जैसे जल बिन हो मछली का तड़पन ।
तुम न हो तो, ऋतु शरद की नहीं सुहाती,
खुशियां अब तो देहरी से ही वापस लौट आती ।
सूना-सूना लगता है अब जग सारा,
तुम बिन यह घर लगता अब कारा।
झूठी-झूठी लगती है अब प्यार की बातें,
तुम बिन नहीं कट पाती यह सुहानी रातें ।
जीवन ज्योति जलाने की सोंची थी,
लेकिन अधरों की हंसी चुरा ली,
हे ईश्वर तूने यह कैसा मीत दिया ।
अब तो लाौटकर आ जाओ,
लो आज का दिन भी बीत गया ।
प्यार की यह कैसी परिभाषा,
जीवन मांगी वहां मिली निराशा ।
तुम गयी तो, जैसे उजड़ गया मेरा जनवासा,
एक सपन भी, पास न आकर दी है दिलासा ।
मांगी थी जन्नत तुमसे,
पर धरती भी मैं शेष न पाया ।
मेरा हंसते-हंसते जीना,
क्यों पल भर भी तुझको रास न आया।
मेरे नयनों में अश्क भिगोकर,
क्या खाक है तुमने पाया,
मेरे जीवन की कश्ती डुबाकर,
कह दो मेरा जी भर आया।
धड़-धड़ करती गीत पसंद न था,
फिर भी तुमने तेज धड़कती धड़कन का,
यह कैसा संगीत दिया
अब तो लौटकर आ जाओ,
लो आज का दिन भी बीत गया ।
उस नीली छतरी वाले मालिक ने,
कैसा गजब है मुझ पर ढाया ।
क्षण भर भी जुल्फ घनेरी छांव में,
मेरा सुस्ताना उसको एक न भाया ।
न पीली हुई थी मेरी काया,
न ही तूने ब्याह रचाया।
हे ईश्वर तूने मुझको,
यह कैसा विधुर बनाया।
पूजा में हुई थी भूल कहां,
या किसने मुझसे धोखा पाया,
प्रीति छीनकर बना दिया वियोगी,
ऐ मालिक किस जुल्म की यह तूने सजा सुनाया।
सचमुच डर सा लगता,
जब से उठी तुम्हारी साया,
पल-पल भारी लगता मुझको,
अब मेरी ही काया ।
मुझे अभागन सी लगती,
अब मेरी ही छाया,
मिलन न हुई थी दे गयी विरह,
है यह तेरी कैसी माया ।
माया के बंधन में पड़कर,
क्यूं तूने मेरा जीवन, रीत किया ।
अब तो लौटकर आ जाओ,
लो आज का दिन भी बीत गया ।
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